फ्लैट रेट वाले लोन को उसकी रिड्यूसिंग बैलेंस दर में बदलिए, या रिड्यूसिंग दर को उस फ्लैट दर में जो उतना ही कुल ब्याज लेती है। तभी दोनों की तुलना ईमानदार होती है।
फ्लैट दर रिड्यूसिंग दर से छोटी क्यों दिखती है?
क्योंकि फ्लैट दर लोन का बड़ा हिस्सा चुका देने के बाद भी शुरुआती मूलधन पर ही ब्याज लेती रहती है। रिड्यूसिंग दर सिर्फ़ बचे हुए बकाया पर लगती है, इसलिए उतना ही पैसा वसूलने के लिए उसका सालाना प्रतिशत ऊपर रखना पड़ता है।
दो बैंक तुलना करते समय किस दर पर भरोसा करूँ?
हो सके तो सब कुछ रिड्यूसिंग बैलेंस वाली तरफ़ लाकर तुलना कीजिए। EMI वाले लोन का यही चलन है। फ्लैट वाली दर को पहले बदलना पड़ता है, तभी वह EMI वाले प्रस्ताव के सामने ईमानदारी से रखी जा सकती है।
यह पन्ना दो मासिक किस्तें क्यों दिखाता है?
ताकि आप ख़ुद देख सकें कि बदलाव सही बैठा। बराबर की दर मिल जाने के बाद फ्लैट मासिक किस्त और रिड्यूसिंग बैलेंस वाली EMI लगभग एक जैसी आनी चाहिए।
क्या इसमें फ़ीस और बीमा भी जुड़ा है?
नहीं। यह सिर्फ़ ब्याज के ढाँचे की तुलना करता है। प्रोसेसिंग फ़ीस, बीमा और टैक्स असल में कौन सा प्रस्ताव सस्ता है, यह बदल सकते हैं।
क्या असली रिटेल लोन में फ्लैट ब्याज चलता है?
गाड़ी, कंज़्यूमर ड्यूरेबल और छोटे लोन के विज्ञापनों में यह अब भी दिखता है, और बिना दस्तावेज़ वाले उधार में तो आम है। दिक्कत इसके होने में नहीं है। दिक्कत तब है जब इसे सीधे EMI वाली दर के सामने ऐसे रख दिया जाए मानो दोनों प्रतिशत का मतलब एक हो।