इन-हैंड सैलरी कैलकुलेटर

अपना CTC भरिए और महीने की इन-हैंड सैलरी निकालिए। बेसिक, HRA और अलाउंस अलग दिखते हैं, फिर EPF, प्रोफेशनल टैक्स और सस्ती टैक्स व्यवस्था के हिसाब से इनकम टैक्स घटता है।

मेरी इन-हैंड सैलरी CTC से इतनी कम क्यों है?

CTC में वह सब गिना जाता है जो नियोक्ता आप पर ख़र्च करता है, उसका प्रोविडेंट फ़ंड वाला हिस्सा और अलग रखी गई ग्रेच्युटी भी। इनमें से कुछ भी इस महीने आपके खाते में नहीं आता। उसके बाद जो बचता है उसमें से आपका अपना EPF, प्रोफेशनल टैक्स और इनकम टैक्स निकलता है। 20% से 30% का यह फ़ासला आम है।

बेसिक का प्रतिशत कितना रखूँ?

अपना ऑफ़र लेटर देखिए। ज़्यादातर भारतीय नियोक्ता बेसिक वेतन CTC का 35% से 50% रखते हैं। बेसिक ऊँचा होने पर आपका प्रोविडेंट फ़ंड और ग्रेच्युटी बढ़ जाते हैं, जो लंबी अवधि की बचत के लिए अच्छा है और आज की इन-हैंड सैलरी घटा देता है।

यह कौन सी टैक्स व्यवस्था लगाता है?

दोनों, और फिर सस्ती वाली रख लेता है। आपके नियोक्ता ने आपकी व्यवस्था पहले ही तय कर दी हो तो आप ख़ुद एक चुन सकते हैं। नई व्यवस्था आम तौर पर जीतती है, जब तक आप बड़ी HRA छूट, होम लोन के ब्याज की कटौती या पूरा 80C न ले रहे हों।

क्या प्रोफेशनल टैक्स हर जगह एक जैसा है?

नहीं। प्रोफेशनल टैक्स राज्य का लेवी है, इसलिए स्लैब इस पर है कि आप काम कहाँ करते हैं। संविधान का अनुच्छेद 276(2) इसे साल में ₹2,500 पर रोक देता है, और ₹2,400 कर्नाटक, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में पूरे साल का आम आँकड़ा है। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब इसे लेते ही नहीं, वहाँ यह शून्य रहता है। हमारी स्रोत फ़ाइल में राज्यों के स्लैब जाँचे नहीं गए हैं, इसलिए वही रकम भरिए जो आपकी पे-स्लिप पर छपी है।

क्या इसमें मेरा बोनस शामिल है?

तभी, जब आप उसे CTC वाले आँकड़े में जोड़ दें। परफ़ॉर्मेंस बोनस आम तौर पर साल में एक बार मिलता है और बाक़ी सैलरी के साथ ही टैक्स में आता है, इसलिए उसे बारह महीनों में बाँट देने से आम महीना बढ़ा-चढ़ाकर दिखता है।

मेरा नियोक्ता पेंशन स्कीम में ₹1,250 ही क्यों डालता है?

क्योंकि पेंशन वाला हिस्सा रुपये में बँधा है। EPS महीने के ₹15,000 तक की तनख़्वाह का 8.33% लेता है, जो ₹1,250 बनता है। नियोक्ता के 12% में से उससे ऊपर का सारा पैसा आपके EPF खाते में ही जाता है।